संस्कृत महाविद्यालय में संस्कृत सप्ताह का हुआ शुभारंभ

Shivdev Arya

हरिद्वार।आज  श्रीभगवानदास आदर्श संस्कृत महाविद्यालय हरिद्वार में, संस्कृत सप्ताह का शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर महाविद्यालय द्वारा भारत में मन्दिर संस्कृति विषय पर एक द्विदिवसीय राष्ट्रिय संगोष्ठी का आयॊजन किया गया। मन्दिरों का भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व है। प्राचीन काल में ये मन्दिर अध्यात्म, राजनीति और पठन पाठन के केन्द्र रहें हैं। मन्दिरों के बिना भारतीय संस्कृति की कल्पना व्यर्थ है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डा. भोला झा ने कहा कि मन्दिर भारतीय संस्कृति का स्वर्णिम इतिहास है। इनकी वास्तुकला, स्थान और  परम्पराओं का वैज्ञानिक महत्व है। मन्दिर अध्यात्म शक्ति के केन्द्र हैं। निराश एवं हताश व्यक्ति भी जब मन्दिर जाता है, तो वह अपने को ऊर्जावान अनुभव‌ करता है। साहित्य अकादमी व राष्ट्रपति  पुरस्कार से पुरस्कृत , संस्कृत के हास्य व्यंग्य के प्रसिद्ध कवि डा. प्रशस्यमित्र शास्त्री  ने सारस्वत अतिथि के रूप में  अपनी कविताओं के माध्यम से मन्दिर संस्कृति पर प्रकाश डालते कहा कि आज तक सनातन वैदिक परम्परा के अविच्छिन्न रहने में मन्दिरों का महत्वपूर्ण योगदान है। वेदादि आदि शास्त्रों की रक्षा में मन्दिरों का विशेष योगदान है। विशिष्ट अतिथि भारत सरकार के विदेश मंत्रालय और विद्युत मन्त्रालय के राजभाषा सलाहकार समिति के सदस्य डा. यतीन्द्र कटारिया ने कहा कि विदेशों में भी भारत के मन्दिरों के प्रति लोग बहुत श्रद्धा रखते हैं। विदेशी लोग जीवन में एक बार भारत के मन्दिरों के दर्शन करने की अभिलाषा करते हैं। उन्होंने कहा कि अंकोरवाट आदि के मन्दिर भारतीय संस्कृति के गौरव का स्मरण करा रहे हैं। फिजी, मारीशस, नेपाल, नीदरलैंड, यूरोप, अमेरिका आदि देशों में मन्दिर संस्कृति के माध्यम से लोग परस्पर जुड रहें हैं। संगोष्ठी के उद्घाटन के उपरान्त एक कवि सम्मेलन का भी आयोजन किया गया। जिसमें डा. प्रशस्यमित्र शास्त्री, डा. निरंजन मिश्र, डा. शैलेश कुमार तिवारी, डा. सर्वेश कुमार तिवारी, डा. वेदव्रत आदि संस्कृत कवियों ने अपनी ओजस्वी कविताओं के माध्यम से  सभी को आह्लादित किया। इस अवसर पर उपस्थित सभी अतिथियों का स्वागत एवं अभिनन्दन महाविद्यालय के प्रभारी प्राचार्य डा. ब्रजेन्द्र कुमार सिंहदेव ने किया। कार्यक्रम का संयोजन डा. रवीन्द्र कुमार व डा. आशिमा श्रवण ने किया। कार्यक्रम में डा. मंजू पटेल, डा. दीपक कोठारी , डा. आलोक सेमवाल, डा. प्रमेश बिजल्वाण, डा.भूपेन्द्र कुमार आदि के साथ सभी छात्र उपस्थित रहें। आगामी सत्रों में दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड आदि प्रान्तों के विद्वान् भी संगोष्ठी के विषय पर अपने शोध-पत्र पढ़ेंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

मृतक श्राद्ध का विचार वैदिक सिद्धान्त पुनर्जन्म के विरुद्ध है

महाभारत युद्ध के बाद वेदों का अध्ययन-अध्यापन अवरुद्ध होने के कारण देश में अनेकानेक अन्धविश्वास एवं कुरीतियां उत्पन्न र्हुइं। सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर से प्राप्त वैदिक सत्य सिद्धान्तों को विस्मृत कर दिया गया तथा अज्ञानतापूर्ण नई-नई परम्पराओं का आरम्भ हुआ। ऐसी ही एक परम्परा मृतक श्राद्ध की है। मृतक […]

You May Like