
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किं च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥ १ ॥
जो कुछ इस संसार में अपूर्ण अथवा पूर्ण वस्तुएँ हैं, उन सब में ईश्वर का निवास है अथवा ईश्वर से ढकी हुई हैं अर्थात् प्रत्येक वस्तु में ओत-प्रोत है । किसी पर्वत की गहरी से गहरी ऐसी गुफा नही, जिसमें ईश्वर विद्यमान न हो; कोई समुद्र की गहरी से गहरी ऐसी तह नही, जहाँ ईश्वर न हो , कोई पर्वत की चोटी ऐसी नही, जहाँ परमात्मा न हो । सूर्य्यलोक, चन्द्रलोक, तारागण इत्यादि जितने भी लोक-लोकान्तर है, सब स्थानों में परमात्मा विद्यमान है । किसी स्थान पर मनुष्य परमात्मा से छिप नही सकता । जो ईश्वर की आज्ञा के विरुद्ध करते है अर्थात् ईश्वर को भुला देते है, वे जन्म-मरण के दुखों को भोगते है । इसलिये प्रत्येक मनुष्य को चाहिये कि परमात्मा को सब जगह उपस्थित जाने, तब उसके विरुद्ध करने से दुख की उत्पत्ति का ज्ञान होने से कभी पाप करने के लिये उद्यत न हो । किसी का धन लेने की इच्छा न करे, क्योकि परमात्मा का नियम है कि प्रत्येक मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार भोग देता है किसी मनुष्य को उसके विरुद्ध स्वेच्छा से भोग प्राप्त नही हो सकता । अतः दूसरे का धन लेने की इच्छा से पाप तो अवश्य होगा ही और भोग में कुछ भी अन्तर नहीं आयेगा । इसी को लोभान पापान कहते हैं । प्रश्न— यद्यपि इस वेद-मन्त्र से ईश्वर का सर्व-व्यापी होना पाया जाता है, परन्तु हम ईश्वर को कहीं नही देखते । अब हम तुम्हारे इस वेद-मन्त्र को मानें या अपनी आखों से देखी हुई वस्तुओं का विश्वास करें । यदि ईश्वर है, तो बताओ कहाँ है ? उत्तर— बहुत-सी ऐसी वस्तुएं है जो सूक्ष्मता और दूरी आदि के कारण दिखाई नही देतीं, परन्तु उनकी सत्ता को सब मनुष्य मानते है जैसे बुद्धि, आत्मा, दुख इत्यादि है । इससे सिद्ध हुआ है कि संसार में ऐसी वस्तुएं विद्यमान है, जिनको मनुष्य इन्द्रियों से नही जान सकते । उनमे से एक ईश्वर भी है । यदि प्रश्न यह हो कि ईश्वर कहाँ है , सर्वथा असंगत है; क्योंकि कहाँ शब्द एक देशी के लिए आता है और वेद मन्त्र ने ईश्वर को सर्वव्यापक बताया है । जैसे कोई कहे कि दूध मे घी या मिश्री में मिठास कहाँ है, तो उत्तर होगा, सर्वत्र । इससे कहाँ का आक्षेप एक देशी वस्तुओं के लिए उचित प्रतीत होता है, सर्व व्यापी के लिये नहीं । प्रश्न— जो मनुष्य ईश्वर को नही मानते, वे अधिक धनवान प्रतीत होते हैं, जैसे चीनी आदि नास्तिक जातियाँ । इससे प्रतीत होता है कि ईश्वर के मानने से दरिद्रता और दुःख प्राप्त होते हैं । उत्तर— प्रथम तो यह प्रश्न ही ठीक नही कि नास्तिक मनुष्य अधिक धनवान होते है, क्योकि ईसाई, यहूदी जो ईश्वर की सत्ता को मानते है, बड़े-बड़े धनवान है । दूसरे धनी होना कोई अच्छी बात नही; किन्तु जितने धनिक देखे जाते है उन सबमे अन्य अधिक बुराइयाँ देखी जाती है । वेदो के माननेवाले तो इस प्रकार के धन को, जिससे मुक्ति मार्ग में बाधा के अतिरिक्त अन्य कोई लाभ नही होता, बुरा मानते है । प्रश्न— क्या कोई मनुष्य बिना धन के सिद्ध-मनोरथ हो सकता है ? उत्तर— संसार मे तो मनुष्य के लिये धन की आवश्यकता होती है, परन्तु उससे मनुष्य अपने लक्ष्य स्थान से सर्वथा दूर हो जाता है । जो लोग संसार और धर्म, दोनो एक साथ प्राप्त करना चाहते है, वे बड़े मूर्ख हैं । प्रश्न— क्या वेदों में धन कमाने की आज्ञा नहीं है ? उत्तर— वेदो में प्रत्येक वस्तु के विषय में, जिनका जीवन में काम पड़ता है, वर्णन है । नीच मनुष्य ही धन की विशेष इच्छा करते हैं, परन्तु वेदों मे धन को कहीं मुक्ति का साधन नही लिखा, किन्तु योगाभ्यास और वैराग्य को मुक्ति का साधन बताया है । वैराग्य का अर्थ सब संसारिक वस्तुओं की इच्छा का त्यागन है । जो मनुष्य संसारिक पदार्थों की इच्छा में फँसे है, वही ईश्वर की आज्ञा के विरुद्ध कार्य करते है । जितने झगड़े संसार में फैले है, उन सबका मूल कारण दूसरों का अधिकार छीनना है । यदि मनुष्य केवल इसी वेद-मन्त्र के समान आचरण वाले हो जावें, तो लड़ाई झगड़े सब दूर हो जावे । चोरी लूट मार दंभ और ठगी का सर्वथा अन्त हो जावे, पुलिस और सेना की आवश्यकता ही न रहे, न्यायालय बन्द दिखाई दें । तात्पर्य यह है कि जितनी बुराइयाँ आज संसार में दिखाई देती है, कही उनका चिह्न भी न दिखाई दे और प्रत्येक मनुष्य संसार में स्वर्ग से बढ़ कर आनन्द उठाने लगे । प्रश्न— क्या ईश्वर के भय से वैराग्य ग्रहण करके कर्मो को सर्वथा त्याग देना चाहिये ।