भारत सरकार से एक नम्र निवेदन-विरजानन्द दैवकरणि

Shivdev Arya

          अभी गत मास अगस्त में भारत सरकार ने तथा इसकी प्रेरणा से सभी देशभक्त भारतीयों ने स्वतन्त्रता प्राप्ति का अमृतमहोत्सव मनाया है, इससे देशवासियों में देशभक्ति का संचार भी हुआ है।

          इसी कार्यक्रम के समय राष्ट्रीयगान ‘जन गण मन’ का भी उच्चारण किया गया। इसे सरकार ने राष्ट्रगान नाम से ग्रहण करके झण्डे की भांति सम्मान दिया हुआ है। परन्तु इस गान का अब वह समय नहीं रहा है, जिस समय और जिस परिस्थिति में इसको गाया गया था। भौगोलिक दृष्टि से सिन्धप्रान्त पाकिस्तान में चला गया, यदि गुजरात को भी वहीं का माना जाये तो वह भी भारत में नहीं रहा। यदि वर्तमान गुजरात की ओर यह संकेत है तो कोई आपत्ति नहीं है। बंगाल भी आधा विदेश बन गया है और जार्ज पंचम जिसकी स्तुति में यह गाया था, उसके शासन काल 1911 से 1937 तक भारत के हजारों देशभक्तों को फांसी, कालापानी, तोप से उड़ाया जाना, देशनिकाला आदि के रूप में दण्डित किया गया। अंग्रेज सैनिकों ने ग्राम जलाये, मां-बहनों का अपमान और बलात्कार तक किये, ऐसे शासक का स्तुतिगान भी भारत में होता रहे, यह लज्जा की बात है। इस गान में भारतीयता के अपमान की गंध आती है। अतः राष्ट्रगीत को इसके स्थान पर मान्यता देकर इस राष्ट्रगान की परम्परा को यदि समाप्त कर दिया जाये तो अमृतमहोत्सव के समय एक भूल का सुधार किया जा सकता है।

          इस जार्ज पंचम के पिता एडवर्ड सप्तम ने भारत के एक वीर क्रान्तिकारी मदनलाल घींगड़ा को पफ़ांसी दिये जाने की गुप्तरूप से संस्तुति की थी, जिस कारण 17 अगस्त 1909 ई- को लन्दन में उसे फांसी दे दी गई। एडवर्ड सप्तम ने भारत के वायसराय लार्ड मिण्टो को लिखा कि ‘भारत से ब्रिटेन आने वाले ऐसे लोगों को रोका जाये जिनका यहाँ कोई खास काम नहीं है और जो यहाँ आकर ब्रिटेन विरोधी गतिविधियों में लिप्त हो जाते हैं। ऐसे सिर फिरे भारतीय युवकों के साथ सख्ती से पेश आओ। मदनलाल ढींगरा ने विलियम कर्जन वायली को इंग्लैंड में मारा था, क्योंकि वायली इंग्लैण्ड में उन भारतीय युवक क्रान्तिकारियों को दण्ड दिलवाया था, जो भारत की स्वतन्त्रता के लिए कार्य करते थे। इसीलिये भारतीय सभी छात्र उससे बहुत घृणा करते थे और उसे मौका मिलते ही मार देना चाहते थे।

          ऐसे ही हजारों निर्दोष भारतीयों की हत्या जिसके शासनकाल में हुई हो, ऐसे जार्ग पंचम की स्तुति में गाया जाने वाला राष्ट्रगान भारत के लिए अपमान प्रतीत होता है। अमर शहीर भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, रामप्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आजाद जैसे अगणित वीरों की हत्या इस जार्ज के काल में हुई, अतः भारत सरकार से मेरा नम्र निवेदन है कि इस राष्ट्रगान को बन्द करके इसके स्थान पर वन्देमातरम् वाले राष्ट्रगीत को प्रचलित किया जाये। इस गीत को गाकर हजारों युवक देश के लिए शहीद हो चुके हैं। इससे उनकी स्मृति भी सुरक्षित रहेगी और भारत की जनता को इसकी सच्चाई का भी ज्ञान हो जायेगा।

          स्वतन्त्रता के अमृत महोत्सव की स्मृति में यदि यह ऐतिहासिक निर्णय भारत सरकार ले लेती है तो अमृतमहोत्सव की अन्य सफलताओं के साथ इसकी गणना भी हो सकेगी।

निवेदक

विरजानन्द दैवकरणि

गुरुकुल झज्जर, हरयाणा

मो–9416055702

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