
आज पूरे देश में आजादी का अमृत महोत्सव उत्साह पूर्वक मनाया जा रहा है घर-घर तिरंगा ध्वज फहराया जा रहा है ग्राम, नगर और महानगरों में पर्वतों की चोटियों और मैदानों में भारतीय ध्वज तिरंगे को लेकर आबाल, वृद्ध नर- नारी भारत माता की जय,वंदे मातरम्, के उद्घोषों से आजादी की सुरक्षा भावना को जगा रहे हैं!आज देश आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को स्मरण कर रहा है, सभी राजनीतिक पार्टियां और उनसे जुड़े हुए नेता अपने को देशभक्त दिखलाने की प्रतिस्पर्धा में लगे हुए हैं, किंतु स्वतंत्रता का सर्वप्रथम उद्घोष करने वाले महर्षि दयानंद का उल्लेख ना करके कृतघ्नता का पाप कर रहे हैं!
सन् 1857 का प्रथम स्वाधीनता आंदोलन अंग्रेजों ने बड़ी क्रूरता से कुचल दिया! सेना में भारतीय सैनिकों की संख्या बहुत कम करके अंग्रेज सैनिकों की संख्या बढ़ा दी गई! शासन ब्रिटिश सरकार ने अपने हाथों में ले लिया तथा महारानी विक्टोरिया ने 1858 में घोषणा की, कि भारत की खुशहाली चाहती हूंँ, महारानी विक्टोरिया की घोषणा पर कटाक्ष करते हुए ऋषि दयानंद ने लिखा कि कोई कितनी ही बड़ी (लुभावनी घोषणा) करे, किंतु स्वदेशी राज्य (स्वराज )सर्वोपरि अर्थात् सबसे उत्तम होता है!
अंग्रेज अधिकारी के पूछने पर ऋषि दयानंद निर्भीकता पूर्वक उत्तर दिया,कि मैं तो परमेश्वर से प्रतिदिन प्रार्थना करता हूं कि परमेश्वर वह दिन शीघ्र आवे, जिस दिन विदेशियों का राज्य हमेशा हमेशा के लिए समाप्त हो जाए!
और भारत में भारतीयों का राज्य हो जाए .जब अंग्रेजी पठित व्यक्तियों में यह हीन भावना पैदा हो रही थी !
ऋषि मुनि कुछ नहीं जानते थे अंग्रेजों के कारण भारत की उन्नति हो रही है, इस भ्रम को दूर करने करते हुए ऋषि ने घोषणा की थी कि भारत ही एक ऐसा देश है कि दुनिया में सारी विद्या इस भारत से ही फैली (एतत् देश:) है इसकी प्रशंसा विदेशों में विद्वानों ने भी अपने ग्रंथों में की है, इसके सदृश्य भूगोल में कोई दूसरा देश नहीं है! यही देश पारस मणि पत्थर है जिसे विदेशी (लोहरूपी देश) , छूकर सोने के (अर्थात् वैभवशाली) हो जाते हैं !ब्रह्म-समाज और प्रार्थना-समाज की आलोचना करते हुए ऋषि ने लिखा है कि यह लोग ऋषि मुनियों की प्रशंसा ना करके भरपेट निंदा करते हैं!
भारतीयों को याद दिलाया देखो! यह अंग्रेज अपने देशी (भारत के बने हुए) जूते को ऑफिस में नहीं जाने देते हैं, इतना दूर (अपने देश )से आकर भी अपने वस्त्र और जूतों को इन्होंने नहीं छोड़ा! इस प्रकार भारतीय अस्मिता को जगाने का आजीवन प्रयास ऋषि दयानंद ने किया!
महर्षि दयानंद की प्रेरणा से आर्य समाज लाहौर ने सन् 1879 में देशी वस्त्र (खादी) और देशी खांड की दुकान खोली और स्वदेशी वस्त्रों को पहनने की प्रतिज्ञा आर्य समाज के सदस्यों ने की! मारवाड़़ राज्य का प्रत्येक राज्य कर्मचारी पाली (राजस्थान) की बनी खादी को ही पहनेंगे, यह आदेश जोधपुर नरेश ने ऋषि दयानंद की प्रेरणा से दिया था! सन् 1882 में पंजाब में हंटर कमीशन आया, तब ऋषि दयानंद ने आर्य समाज के अधिकारियों से कहा था कि हंटर कमीशन के आगे यह मांग रखना कोर्ट और तहसील की भाषा हिंदी हो,!
महर्षि दयानंद ने अपने शिष्य तथा आर्य समाज मुंबई के सदस्य श्यामजी कृष्ण वर्मा को लंदन जाने की तथा देश की आजादी के लिए प्रयत्न करने की प्रेरणा दी! श्यामजी कृष्ण वर्मा ने लंदन में इंडिया हाउस की स्थापना करके उस स्थान को आजादी का प्रेरणा स्थल बना दिया! जहां दादाभाई नौरोजी, भाई परमानंद, महात्मा गांधी, वीर सावरकर, लाला हरदयाल, मदन लाल धींगरा, मैडम कामा आदि देशभक्त क्रांतिकारी रहकर देश की आजादी के लिए प्रयत्न करते रहे!
आर्य समाज मेरी मां और ऋषि दयानंद मेरे धार्मिक पिता है, की घोषणा करने वाले लाला लाजपत राय जो 1920 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन के सभापति थे, जिन्होंने साइमन कमीशन का विरोध किया था, सरदार भगत सिंह, ब्रह्मचारी रामप्रसाद बिस्मिल, स्वामी श्रद्धानंद, भाई परमानंद आदि सभी को देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने की प्रेरणा देने वाले महर्षि दयानंद का नाम न लेने का पाप कथित राजनेता कर रहे हैं!
इतिहास इन्हें कभी क्षमा नहीं करेगा, दलित उद्धार हो, स्त्री शिक्षा हो, तथाकथित जाति प्रथा पर कुठाराघात हो, विशाल हिंदू समाज पर होने वाले विधर्मियों ( ईसाइयों और मुसलमानों )के आरोप हों, इन सब की एक चट्टान बनकर इस विशाल समाज और राष्ट्र की रक्षा की ,उनका नाम न लेना ,उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त न करना बहुत बड़ा पाप है !क्या यह सुनियोजित षड्यंत्र तो नहींहै?
आर्य समाज के नेता अधिकारी पदाधिकारी विद्वान् संन्यासी कुंभकरण की नींद में तो नहीं सो रहे हैं ? कोई इनको स्व-कर्तव्य बोध कराएगा या स्वार्थ के वशीभूत सब मौन धारण किए रहेंगे.!
महर्षि दयानंद ने लिखा है कि आर्ष ग्रंथों को पढ़ना समुद्र में गोता लगाना और बहुमूल्य रत्नों को प्राप्त करना है आज योजनाबद्ध तरीके से आर्ष पाठ विधि के गुरुकुलों को समाप्त करने का षड्यंत्र हो रहा है !
आज प्रांतीय सरकारें अपने प्रांत के शिक्षा बोर्ड बनाकर छात्रों एवं शिक्षकों को आर्थिक लाभ का प्रलोभन देकर अष्टाध्यायी ,महाभाष्य, निरुक्त ,दर्शन वेदादि के पारंपरिक पठन-पाठन की प्रक्रिया को समाप्त किया जा रहा है, यदि ऐसा ही कुछ समय तक होता रहा तो गुरुकुल आर्ष पाठ विधि वैदिक सिद्धांत आदि का नाम मात्र शेष रह जाएगा! इनके सुरक्षित न रहने पर विशाल हिंदू समाज भी सुरक्षित नहीं रहेगा क्योंकि तथाकथित हिंदू जाति और राष्ट्रीय स्वाभिमान की सुरक्षा कवच तो आर्य समाज वेदादि आर्ष ग्रंथ तथा इन को स्पष्ट करने वाले ऋषि दयानंद हैं!
इनको योजनाबद्ध तरीके से समाप्त करने का गहरा षडयंत्र करना बंद कर दें अन्यथा मानव समाज सुरक्षित नहीं रहेगा ,जैसा कि लिखा है– धर्म एव हतो हंति!
-अध्यक्ष- वैदिक मिशन मुम्बई,
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