
आर्य समाज सन 2024 और 2025 में महर्षि दयानंद का 200 वां जन्मदिवस तथा आर्य समाज का 150 वां स्थापना दिवस विशाल रूप से मनाया जाए इस विषय में आर्य समाज के पदाधिकारी विचार कर रहे हैं। आर्य समाज स्थापना शताब्दी 1975 के समय जितने संन्यासी, विद्वान, शास्त्रार्थ महारथी, भजनों के माध्यम से वैदिक सिद्धांतों को जन-जन तक पहुंचाने वाले प्रतिष्ठित आर्य भजनोपदेशक, समर्पित कार्यकर्ता और पदाधिकारी थे। आज वे दृष्टिगोचर नहीं हो रहे हैं। वैदिक सिद्धांतों के शिक्षण केंद्र, विद्वानों के निर्माण स्थल, वैदिक धर्म के प्रचार प्रसार के लिए समर्पित जीवन निर्माण के केंद्र गुरुकुल थे, आज उनको समाप्त करने का गहन षड्यंत्र तथाकथित सांप्रदायिक संगठन तथा विविध प्रांतीय शिक्षा बोर्डों के माध्यम से, अदूरदर्शी व्यक्तियों को आर्थिक प्रलोभन (सरकारी सर्विस से प्राप्त अर्थ लाभ) दिखाकर आर्य समाज को कार्यकर्ता विहीन बनाने का प्रयत्न हो रहा है। महर्षि दयानंद ने अष्टाध्यायी, महाभाष्य, निरुक्त, दर्शनशास्त्र, ब्राह्मण एवं वेदादि शास्त्रों के अध्ययन अध्यापन ( आर्ष पाठ विधि) का उल्लेख किया है। जब तक सरकारी परीक्षा से दूर रहकर इन ग्रंथों का पठन-पाठन होता रहा तब तक ये ग्रंथ सुरक्षित रहे तथा विद्वान भी तैयार होते रहे। गुरुकुलों के तत्कालीन आचार्य आर्थिक प्रलोभन में नहीं आए तथा अपने लक्ष्य वैदिक धर्म की रक्षा में लगे रहे। सन 1917 में चेम्सफोर्ड (अंग्रेज अधिकारी) गुरुकुल कांगड़ी को देखने आया उस समय उसने अंग्रेज सरकार की ओर से एक लाख रुपए गुरुकुल को देने की घोषणा की तब स्वामी श्रद्धानंद ने यह कहकर ठुकरा दिया कि मैं सोने के पिंजरे में बंद होना नहीं चाहता। उन्होंने सरकारी उपाधियां/ डिग्री लेना भी स्वीकार नहीं किया। विद्यालंकार, वेदालंकार , सिद्धांतालंकारादि अपनी उपाधियां दी। उस समय गुरुकुल कांगड़ी के जो भी स्नातक निकले उन्होंने अपनी विद्वता से दुनिया के हर क्षेत्र में नया कीर्तिमान स्थापित किया। गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) सन 1965 में श्री भक्त दर्शन शिक्षा राज्य मंत्री (भारत सरकार) आए थे। उन्होंने सरकारी अनुदान देने और गुरुकुल में सरकारी परीक्षा होनी चाहिए का सुझाव दिया था। उसका तुरंत विरोध करते हुए आचार्य भगवान देव (स्वामी ओमानंद जी) ने कहा था कि मैं सरकारी नौकर नहीं मैं विद्वान तैयार कर रहा हूं और किसानों से ब्रह्मचारियों के लिए अन्न मांगता हूं। इसी भावना का परिणाम था कि 1965 से पहले जितने विद्वान स्नातक गुरुकुल झज्जर से निकले उन्होंने आर्य समाज के हर क्षेत्र में सराहनीय कार्य किया। सरकारी परीक्षाओं के शुरू होने पर वह श्रंखला बंद हो गई। चाहे गुरुकुल कांगड़ी हो गुरुकुल वृंदावन हो गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर हो। सबने अपनी उपाधियां, अलंकार, स्नातक भास्कर दी। लेकिन सरकारी सहयोग नहीं लिया। आर्य समाज के लिए एक से एक मूर्धन्य विद्वान तैयार हुए । जिन्होंने लेखन प्रचार शास्त्रार्थ, पत्रकारिता और देश की स्वतंत्रता के लिए महान कार्य किया और आत्म बालिदान दिया। देव दयानंद के अनुयायियों का नैतिक कर्तव्य है कि दयानंद के निर्दिष्ट आर्ष पाठ विधि के पठन पाठन की प्रक्रिया को सुरक्षित रखे।
सरकारी परीक्षा देने व सरकारी नौकरी करने की कामना वाले व्यक्तियों पर ही ध्यान न देकर जो आर्ष पाठ विधि के पठन-पाठन और उसकी सुरक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले व्यक्तियों के लिए दानी महानुभाव और पदाधिकारी पूरा ध्यान दें। जिन्होंने अपना लक्ष्य (ब्राह्मणेननिष्कारणो धर्मः षडंगो वेदोऽध्येयो ज्ञेयश्चेति )
प्रत्येक गुरुकुल में सरकारी परीक्षा देने वालों के अतिरिक्त आर्ष पाठ विधि के पठन-पाठन की एक कक्षा हो भले ही उसमें दो चार समर्पित बालक बालिकाएं हों । अध्ययन के समय और अध्ययन के बाद निस्वार्थ भाव से आर्य समाज का कार्य करने वाले समर्पित विद्वानों को उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले उदारमना दानी महानुभाव , वैदिक धर्म की रक्षा का व्रत लेने वाले समर्पित विद्वानों के द्वारा ही वैदिक धर्म सुरक्षित रहेगा। यह बात तथाकथित नेताओं को हृदय में डाल लेनी चाहिए अन्यथा आर्य समाज की स्थिति प्रार्थना समाज और ब्रह्म समाज की तरह हो जाएगी। सन 1829 या उसके आसपास बंगाल में ब्रह्म समाज की स्थापना हो गई थी तथा 1869 में महाराष्ट्र में प्रार्थना समाज की स्थापना हो गई थी। अपने लक्ष्य से भटकने के कारण दोनों संस्थाओं का नाममात्र शेष रह गया है। कहीं यही स्थिति आर्य समाज की ना हो जाए। वे लोग मरे हुए हैं जो अपने सामने अपने कुल समाज का विनाश होता देखते हैं। (“मृतास्ते ये तु पश्यंति देशभंगं कुलक्षयम्” ) परिवार या समाज ईंट पत्थरों से बने हुए भवन से सुरक्षित नहीं रहता। अपितु उन भवनों में रहने वाले व्यक्तियों से समाज या परिवार सुरक्षित रहता है। व्यक्तियों के निर्माण के लिए पंच महायज्ञ, वर्णाश्रम व्यवस्था, षोडश संस्कार विधि को व्यवहार में अपनाना आवश्यक है। जनसंपर्क के लिए जनसेवा जिसे ऋषि ने स्पष्ट किया था कि “संसार का उपकार करना आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य है” इस और ध्यान न देने से भी समाज में शिथिलता आ रही है। आज नेता, पदाधिकारी,विद्वान, संन्यासी अपने उत्तराधिकारियों का निर्माण करने के विषय में गंभीर नहीं हैं। एक दिन उन्हें दुनिया से जाना ही है। इसका कोई विकल्प नहीं है। अतः अपने सामने उत्तराधिकारी तैयार किया जाए। अपने अनुभव से उनका मार्ग प्रशस्त किया जाए और भविष्य में आने वाली समस्याओं से सावधान किया जाए। इस ओर ध्यान न देना यह भी एक सामाजिक अपराध है। अपने उत्तराधिकारी को तैयार करें और ऋषि दयानंद के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करें। ऋषि दयानंद ने लगभग 58-59 वर्षों की आयु में अपनी उतराधिकारिणी परोपकारिणी सभा बना दी थी। इतना ही नहीं अपनी वसीयत में अपने अंत्येष्टि संस्कार की भी चर्चा कर दी थी जिससे हजारों वर्षों से चली आ रही (संन्यासी को जल समाधि की) मिथ्या परंपरा को दयानंद ने तोड़ दिया। आर्य समाज से तहरीर और तकरीर लेखनी और वाणी से प्रचार का कार्य चलता रहे यह पंडित लेखराम ने अंतिम समय में कहा था। ओर यह तभी संभब है जब आर्य समाज कार्यकर्ताओं के निर्माण पर केंद्रित होगा। कार्यकर्ताओं का निर्माण आर्य वीर दल व आर्य वीरांगना दल के शिविरों से आर्य समाज की दैनिक शाखाओं से होगा। विद्वानों का निर्माण, जीवनदानी कार्यकर्ताओं का निर्माण गुरुकुलों से होगा। इस लिए आर्य समाज के भविष्य को देखते हुए विद्वान निर्माण व कार्यकर्ता निर्माण का कार्य तेज करना चाहिए।
-अध्यक्ष वैदिक मिशन मुंबई
Co.No.-9869668130