
गुरुकुल पौन्धा देहरादून में नवप्रविष्ट 31 ब्रह्मचारियों का उपनयन एवं वेदारम्भ संस्कार आयोजित हुआ, जिसमें संस्कार के ब्रह्मा डॉ. रवीन्द्र कुमार रहे। उपनयन संस्कार को यज्ञोपवीत संस्कार भी कहते हैं। वेदारम्भ संस्कार के माध्यम से बालक शिक्षा का प्रारम्भ करता है। डॉ. रवीन्द्र कुमार ने बताया कि संस्कार ही प्रत्येक मानव को मानव बनाने का कार्य करता है। यदि संस्कार से विहीन मनुष्य हो तो वह मनुष्य होते हुए भी पशु के समान है। पितृउपदेश में पं. कुंवरपाल शास्त्री ने कहा कि हे विद्यार्थिओं आज से तुम आचार्य के अधीन हो, जिस प्रकार की उच्च शिक्षा आचार्य दे उसे स्वीकार करना। विद्या के पठन-पाठन में कभी की आलस्य व प्रमाद नहीं करना। विद्या ही सत्य का मार्ग दिखाती है, अतः विद्या के पठन-पाठन में निरन्तर उन्नति करनी है। संस्कार में आचार्यत्व की भूमिका निभा रहे आचार्य यज्ञवीर ने गायत्री का उपदेश देते हुए कहा कि जिस प्रकार से गायत्री में तीन चरण है, उसी प्रकार से विद्याध्ययन करना है। किसी भी ज्ञान को एक बार में ही नहीं सीखा जा सकता है, अतः उस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए उसको विभिन्न भागों में विभक्त कर सीखने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का संयोजन कर रहे आचार्य डॉ. धनंजय ने बताया कि ये बालक ही देश के भविष्य हैं, ये संस्कारवान् होकर निरन्तर देश को नई दिशा व दशा प्रदान करेंगे। संस्कार के पश्चात् में सभी नवप्रविष्ट ब्रह्मचारियों ने भिक्षा याचना कर अपने गुरु को समर्पित की। इस अवसर पर नवप्रविष्ट ब्रह्मचारियों के कार्यक्रम आयोजित हुए जिसमें 16 बालकों ने एक-एक संस्कार का परिचय कराया और एक सामूहिक भजन भी प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर मनमोहन आर्य, पवन सिंह आर्य, अनन्त आर्य, डॉ. शिवकुमार, शिवदेव आर्य, ज्ञानचन्द गुप्त, राहुल, दिनेश, सूर्यप्रताप, अंकित आर्य, अनुभव आर्य, विवेक आदि गणमान्य सदस्य उपस्थित रहे।
आधुनिकता की दौड़ में पहाड़ियों के बीच प्रकृति की गोद में स्थित आर्ष गुरु कुल पोंधा देहरादून के समस्त आचार्य व प्रबंधक को बहुत-बहुत धन्यवाद आपका यह महान कार्य है हम हमेशा आपके ऋणी रहेंगे 🙏🙏🙏💐💐💐💐