सत्यासत्य विवेक ही वैराग्य है-आचार्य डॉ. अखिलेश शर्मा

Shivdev Arya

महरौनी (ललितपुर) 6 मई 2022 : महर्षि दयानन्द सरस्वती योग संस्थान आर्य समाज महरौनी के तत्वाधान में वैदिक धर्म को जन जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से संयोजक आर्य रत्न शिक्षक लखन लाल आर्य द्वारा आयोजित व्यख्यान माला के क्रम में “वैराग्य शतक” विषय पर वैदिक प्रवक्ता आचार्य डॉक्टर अखिलेश शर्मा जलगाँव महाराष्ट्र ने कहा कि संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं कुछ लोगों को जीवन का सार पता चल जाता है इसलिए वे वैराग्यवान हो जाते हैं तो कुछ लोग को खाने पीने को नहीं मिलता है तथा परिवार से समाज से दुखी होकर किन्ही विशेष परिस्थितियों में घर को छोड़ देते हैं लोग उन्हें भी वैराग्य वान कहते हैं। परंतु ऐसा नहीं है जब तक ध्यान पूर्वक वैराग्य ना आए तब तक वैराग्य अधूरा है अपूर्ण है। कुछ ऐसे तथाकथित वैरागी लोगों को देखकर कवि मैथिली शरण गुप्त ने कहा था की आज वैराग्य का चिन्ह बस जटा बढ़ाना दाढ़ी बढ़ाना भस्म लगाना माला जाप करना या वस्त्र परिवर्तन कर लेना ही दिखाई देता है जबकि वास्तव में जब तक कामिनी और कंचन नहीं छूटता है तब तक वैराग्य अपूर्ण है। वैराग्य के लिए विवेक अत्यंत आवश्यक है विवेक कहते हैं सत्य और असत्य के ज्ञान को जब तक हमें सत्य क्या है और असत्य क्या है यह समझ में नहीं आता है तब तक वैराग्य की बात करना केवल आडंबर करना ही होगा। उदाहरण के रुप में यदि हम देंखे तो संसार में सभी चीजें नाश वान है एक न एक दिन नष्ट होने वाली हैं और यदि कोई वस्तु हमारे सामने नष्ट हो जाती है हम बड़े दुखी हो जाते हैं परेशान हो जाते हैं हम यह सोचते हैं कि यह वस्तु नष्ट क्यों हो गई और रोते रहते हैं।वैराग्य वान व्यक्ति कुछ अलग सोचता है वह यह सोचता है कि संसार की सारी चीजें एक न एक दिन नष्ट होने ही वाली है यह सत्य विचार वह अपने मन में बैठा लेता है जब भी कोई वस्तु नष्ट होती है तो उसका सोचा हुआ वह विचार उसके सामने आ जाता है और वह उस नष्ट हो चुकी वस्तु के विषय में सुख-दुख या शोक नहीं करता है। इसे ही वैराग्य कहते हैं। वास्तव में वैराग्य शब्द संस्कृत के वि उपसर्ग एवं राज धातु से मिलकर बना है। वी का अर्थ होता है विशेष रूप से एवं राज का अर्थ होता है प्रकाशमान देदीप्यमान। राज शब्द से ही राग शब्द बना है राग का अर्थ होता है सुख द्वेष का अर्थ होता है दुख जो सुख और दुख से परे हो जाए वही वैराग्य कहलाता है।
संचालन संयोजक आर्य रत्न शिक्षक लखन लाल आर्य एवं आभार मुनि पुरुषोत्तम वानप्रस्थ ने जताया।

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